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देहरादून में काल बने 56 जर्जर स्कूल धराशायी, DM की इस सख्ती ने बचाई मासूमों की जान

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बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं; देहरादून के 64 स्कूलों पर बड़ी कार्रवाई, देखें लिस्ट

देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी में नौनिहालों के सिर पर मंडरा रहा मौत का साया अब हमेशा के लिए खत्म हो गया है। जिला प्रशासन ने जिले के विभिन्न विकासखंडों में वर्षों से खंडहर बने 56 स्कूल भवनों को मलबे में तब्दील कर दिया है। जिलाधिकारी के कड़े तेवरों के बाद शिक्षा विभाग ने यह बड़ी कार्रवाई की है, जिससे उन स्कूलों में हड़कंप मच गया है जहाँ जर्जर ढांचों को नजरअंदाज किया जा रहा था।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सख्त निर्देशों का पालन करते हुए प्रशासन ने उन 64 भवनों को चिन्हित किया था, जो पूरी तरह निर्जीर्ण हो चुके थे। इनमें से 56 को ध्वस्त किया जा चुका है, जबकि बचे हुए 8 भवनों को अगले एक महीने के भीतर जमींदोज करने का अल्टीमेटम जारी किया गया है। मुख्य शिक्षा अधिकारी ने इस पूरी कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौंप दी है।

प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक, इस अभियान के तहत 4 माध्यमिक और 52 प्रारंभिक विद्यालय भवनों को पूरी तरह गिरा दिया गया है। केवल पूरी बिल्डिंग ही नहीं, बल्कि उन कमरों पर भी हथौड़ा चला है जो क्लास चलाने लायक नहीं बचे थे। माध्यमिक विद्यालयों के 7 और प्रारंभिक विद्यालयों के 10 निष्प्रयोज्य कक्षा-कक्षों में से 14 को अब तक हटाया जा चुका है। शेष 3 कमरों को भी एक माह की समय सीमा के भीतर ध्वस्त करने के निर्देश दिए गए हैं।

शिक्षा अधिकारियों और प्रधानाचार्यों की जवाबदेही तय करते हुए प्रशासन ने साफ कर दिया है कि सुरक्षा के मानकों पर कोई समझौता नहीं होगा। चकराता ब्लॉक में सबसे ज्यादा 23 भवन चिन्हित किए गए थे, वहीं कालसी में 17, विकासनगर में 8, सहसपुर में 2, रायपुर में 14 और डोईवाला में 17 भवनों पर कार्रवाई की रूपरेखा तैयार की गई थी। अब तक कुल 70 विद्यालय भवनों और कमरों को गिराया जा चुका है।

जिन 11 भवनों या कक्षों का ध्वस्तीकरण तकनीकी या अन्य कारणों से अटका हुआ है, उनके लिए शासन को एक माह का अतिरिक्त समय देने का प्रस्ताव भेजा गया है। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया है कि ध्वस्तीकरण के दौरान बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए वैकल्पिक शिक्षण केंद्रों की व्यवस्था पहले ही सुनिश्चित कर ली गई है।

अक्सर पहाड़ी और तराई क्षेत्रों में बरसात के दौरान ऐसे जर्जर भवनों के गिरने से बड़ी दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है। इस बार प्रशासन ने मॉनसून और सत्र के बीच में ही जोखिम को खत्म करने का फैसला लिया। डीएम ने दो टूक कहा है कि विद्यार्थियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी कीमत पर बच्चों को असुरक्षित छतों के नीचे बैठने पर मजबूर नहीं किया जाएगा।

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