Pitru Paksha Shradh Puja : पितृपक्ष का समय ऐसा माना जाता है जब व्यक्ति अपने पूर्वजों को याद कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करता है।
इस दौरान श्रद्धापूर्वक पिंडदान, तर्पण और अन्नदान किया जाता है। मान्यता है कि इससे पितर प्रसन्न होकर परिवार पर सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद बरसाते हैं।
पद्मपुराण और अन्य शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि श्राद्ध के समय कुछ खास नियमों और परंपराओं का पालन करना बहुत जरूरी है।
श्राद्ध में किसे बुलाना चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध में बहन, भांजे और दामाद को जरूर आमंत्रित करना चाहिए।
कहा गया है कि यदि ये तीनों 5 कोस (लगभग 10–15 किलोमीटर) की दूरी पर रहते हों और फिर भी उन्हें नहीं बुलाया जाए, तो पितर अन्न स्वीकार नहीं करते।
श्राद्ध में दौहित्र (बेटी का बेटा) विशेष महत्व रखता है। उसे 100 ब्राह्मणों के बराबर माना गया है, इसलिए उसका श्राद्ध में आना शुभ फलदायक होता है।
दक्षिणा और दान से जुड़े नियम
यदि ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए तो उन्हें आदरपूर्वक वस्त्र, ताम्बूल (पान-सुपारी) और दक्षिणा भी देनी चाहिए।
यह भी कहा गया है कि यदि किसी निमंत्रित ब्राह्मण के साथ अन्य ब्राह्मण भी आ जाएं तो दोनों का सम्मानपूर्वक सत्कार करना चाहिए।
यदि केवल एक ब्राह्मण को दान दिया जाए और दूसरों को नजरअंदाज किया जाए तो उसका फल नष्ट हो जाता है।
बिना दक्षिणा दिए श्राद्ध अधूरा माना जाता है और ऐसा करने से पितर नाराज हो सकते हैं।
क्या न करें
श्राद्ध के समय क्रोध, लोभ, भय या कामविकार से ग्रसित होकर कर्म नहीं करना चाहिए। इससे श्राद्ध का पुण्य नष्ट हो जाता है।
श्राद्ध केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने का माध्यम है।
यदि इसे पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाए, तो परिवार में पितरों का आशीर्वाद बना रहता है और जीवन में शांति व समृद्धि आती है।
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