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उत्तराखंड: खरसाली गांव में सोमेश्वर देवता मंदिर के कपाट हुए बंद, बैसाखी पर फिर खुलेंगे

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उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में बसा खरसाली गांव एक खास जगह है। यहां मां यमुना का शीतकालीन ठिकाना है और उनके भाई माने जाने वाले शनि देव सोमेश्वर महाराज का प्राचीन मंदिर भी स्थित है। हाल ही में इस मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जब ठंड बढ़ने पर ऊंचाई वाले धामों में बर्फबारी के कारण दर्शन मुश्किल हो जाते हैं।

यह मंदिर गीठ पट्टी क्षेत्र के बारह गांवों का कुल देवता है। दूर-दूर से आने वाले भक्तों की यहां गहरी श्रद्धा जुड़ी हुई है। सोमेश्वर महाराज को शनि देव का रूप माना जाता है और लोग यहां सुख-समृद्धि की कामना लेकर आते हैं। पौराणिक कथाओं में मां यमुना और उनके भाई शनि देव की बहन-भाई की कहानी से जुड़ी यह जगह विशेष महत्व रखती है।

कपाट बंद होने की रस्म और उत्सव

हर साल पौष महीने में संक्रांति के आसपास कपाट बंद करने की प्रक्रिया शुरू होती है। इस बार विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद दोपहर में कपाट बंद किए गए। इससे पहले संक्रांति पर भक्त अपने आराध्य को भेंट चढ़ाते हैं और क्षेत्र की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।

खास बात यह है कि पूजा के दौरान देवता के पश्वा औतरित होते हैं, यानी देवता का आशीर्वाद सीधे भक्तों तक पहुंचता है। इसके बाद पारंपरिक रीति से मंदिर को चार महीनों के लिए बंद कर दिया जाता है। इस मौके पर गांव के लोग उत्साह से जुटते हैं और जयकारे लगाते हैं।

अगला सीजन कब शुरू होगा?

अब मंदिर के कपाट बैसाखी के पर्व पर फिर से खुलेंगे। तब देश-विदेश से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आएंगे। बैसाखी पर विशेष पूजा के साथ छह महीनों तक दर्शन चलते हैं। यह समय गर्मियों का होता है, जब मौसम सुहाना रहता है और यमुनोत्री धाम की यात्रा भी शुरू हो जाती है।

खरसाली गांव यमुनोत्री से करीब छह किलोमीटर दूर है और सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां का प्राचीन मंदिर लकड़ी और पत्थर से बना है, जो सदियों की प्राकृतिक आपदाओं को झेल चुका है। शीतकाल में यहां मां यमुना की उत्सव मूर्ति भी विराजमान रहती है, इसलिए भक्त बिना रुके दर्शन कर सकते हैं।

समिति और स्थानीय लोगों की भूमिका

इस आयोजन में मंदिर समिति के पदाधिकारी और गांव के प्रधान सहित आसपास के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। सबने मिलकर पूजा संपन्न कराई और देवता से क्षेत्र की सुख-शांति की कामना की। यह उत्सव न सिर्फ धार्मिक है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और एकता का प्रतीक भी बनता है।

उत्तराखंड की ये परंपराएं प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलती हैं। ठंड में ऊंचे इलाकों में जाना जोखिम भरा होता है, इसलिए देवताओं को नीचे के गांवों में लाया जाता है। इससे भक्तों को साल भर आशीर्वाद मिलता रहता है। अगर आप भी हिमालय की इन आध्यात्मिक यात्राओं में रुचि रखते हैं, तो अगली बैसाखी पर खरसाली जरूर घूमने जाएं।

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