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Anupama Gulati Murder Case : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राजेश गुलाटी को नहीं दी राहत, सजा बरकरार

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Anupama Gulati Murder Case : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में साल 2010 में हुई एक सनसनीखेज हत्या ने पूरे शहर को हिला कर रख दिया था। एक पति ने अपनी पत्नी की जान ले ली और फिर शव को ठिकाने लगाने के लिए जो तरीका अपनाया, वो सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अब कई साल बाद इस मामले में हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है।

कैसे शुरू हुई थी राजेश और अनुपमा की कहानी

राजेश गुलाटी एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे। साल 1999 में उनकी और अनुपमा की प्रेम विवाह हुआ। शादी के बाद दोनों अमेरिका चले गए, जहां वो अपनी नई जिंदगी बसाने लगे। अनुपमा घर संभालती थीं, जबकि राजेश नौकरी करते थे। करीब छह साल बाद दोनों भारत लौट आए और देहरादून के प्रकाश नगर में किराए के मकान में रहने लगे।

बाहर से सब कुछ सामान्य लगता था, लेकिन घर के अंदर छोटी-छोटी बातों पर झगड़े आम हो गए थे। रिश्ते में कड़वाहट बढ़ती जा रही थी।

वो खौफनाक रात और हत्या का तरीका

17 अक्टूबर 2010 की रात फिर एक बार विवाद हुआ। गुस्से में राजेश ने अनुपमा को थप्पड़ मार दिया। इससे अनुपमा का सिर दीवार से टकराया और वो बेहोश होकर गिर पड़ीं। राजेश घबरा गए। उन्हें लगा कि होश आने पर अनुपमा पुलिस में शिकायत कर देंगी।

इसी डर से राजेश ने अनुपमा की हत्या कर दी। अगले दिन उन्होंने बाजार से एक इलेक्ट्रिक आरी और बड़ा डीप फ्रीजर खरीदा। फिर शव को सत्तर से ज्यादा टुकड़ों में काटा, पॉलीथिन में पैक किया और फ्रीजर में छिपा दिया। कई दिनों तक वो देहरादून के आसपास के इलाकों में इन पैकेट्स को धीरे-धीरे फेंकते रहे, ताकि कोई सबूत न बचे।

कैसे खुला पूरा राज

लगभग दो महीने बाद, 12 दिसंबर 2010 को अनुपमा के भाई सुजान कुमार देहरादून आए। जब उन्होंने बहन के बारे में पूछा तो राजेश टाल-मटोल करने लगे। शक होने पर सुजान ने कैंट थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई।

पुलिस जब घर पहुंची और तलाशी ली तो फ्रीजर से अनुपमा के शव के टुकड़े बरामद हुए। राजेश को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। जांच में सारी भयावह कहानी सामने आ गई।

अदालतों का फैसला

ट्रायल कोर्ट ने इस मामले को बेहद जघन्य अपराध माना। 1 सितंबर 2017 को देहरादून की अदालत ने राजेश गुलाटी को उम्रकैद की सजा सुनाई। साथ ही 15 लाख रुपये का जुर्माना लगाया, जिसमें से कुछ राशि सरकार को और बाकी उनके बच्चों के लिए बैंक में जमा करने का आदेश दिया गया।

राजेश ने इस सजा को उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी। लंबी सुनवाई के बाद जस्टिस रविंद्र मैठाणी और जस्टिस आलोक महरा की बेंच ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया। आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी गई।

यह मामला घरेलू हिंसा और अपराध के छिपे चेहरे को उजागर करता है। साथ ही ये याद दिलाता है कि रिश्तों में संवाद और संयम कितना जरूरी होता है।

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