उत्तराखंड में सरकारी कर्मचारियों से संपत्ति की जानकारी मांगने का मुद्दा इन दिनों काफी सुर्खियां बटोर रहा है। राज्य के कार्मिक विभाग ने हाल ही में सभी कर्मचारियों और अधिकारियों को अपनी संपत्ति का विवरण जमा करने का निर्देश जारी किया है।
यह कदम कर्मचारी सेवा नियमावली का हिस्सा है, जो पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है। लेकिन मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कर्मचारियों पर दबाव बनाने की रणनीति करार दिया है।
चुनावी मौसम में बढ़ती राजनीतिक तकरार
उत्तराखंड की राजनीति में चुनाव हमेशा से ही गर्म मुद्दों का केंद्र रही है। 2022 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बड़ी जीत हासिल की थी, लेकिन अब 2027 के चुनाव नजदीक आते देख विपक्ष सरकार पर हमलावर हो रहा है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है।
उनका मानना है कि सरकार इस माध्यम से कर्मचारियों को चेतावनी दे रही है कि अगर वे चुनाव में सत्ताधारी दल का साथ नहीं देंगे, तो उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। गोदियाल ने यह भी जोड़ा कि राज्य में कई मंत्री ऐसे हैं, जिन पर आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप लगे हैं, लेकिन सरकार उनकी जांच पर चुप्पी साधे हुए है।
पारदर्शिता या राजनीतिक दांव-पेंच?
कर्मचारी सेवा नियमावली के अनुसार, हर साल संपत्ति का ब्यौरा देना अनिवार्य है, जो भ्रष्टाचार को रोकने के लिए 1960 के दशक से चली आ रही व्यवस्था का हिस्सा है। भारत में ऐसे नियम केंद्रीय और राज्य स्तर पर लागू हैं, जहां लाखों सरकारी कर्मचारी हर साल अपनी संपत्ति की रिपोर्ट जमा करते हैं। उत्तराखंड में लगभग 1.5 लाख से ज्यादा सरकारी कर्मचारी हैं, और विभाग का यह रिमाइंडर उनमें से कई को फिर से जागरूक करने का प्रयास है।
लेकिन कांग्रेस इसे चुनावी हथकंडा मानती है। गोदियाल ने मांग की है कि पहले मंत्रियों और विधायकों की संपत्ति को सार्वजनिक किया जाए, ताकि नियम सबके लिए समान हों। उन्होंने कहा कि यह कदम कर्मचारियों को राजनीतिक रूप से प्रभावित करने की कोशिश है, जो लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं।
सत्ताधारी दल का बचाव और सुझाव
दूसरी ओर, बीजेपी ने इसे सामान्य प्रक्रिया बताया है। पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता और विधायक विनोद चमोली ने स्पष्ट किया कि यह कोई नया आदेश नहीं है, बल्कि नियमित अनुपालन सुनिश्चित करने का तरीका है। उन्होंने जोर दिया कि संपत्ति का विवरण देने वाले और लेने वाले दोनों ही सरकारी कर्मचारी हैं, इसलिए इसमें कोई उत्पीड़न नहीं।
चमोली ने आगे सुझाव दिया कि अगर कोई कर्मचारी नियम तोड़ता है, तो उसके प्रमोशन और वेतन वृद्धि पर रोक लगाई जानी चाहिए। उनका तर्क है कि ऐसे कदम भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने में मददगार साबित होंगे। भारत में भ्रष्टाचार सूचकांक के अनुसार, 2023 में देश 93वें स्थान पर था, और उत्तराखंड जैसे राज्यों में पारदर्शिता बढ़ाने से सुधार संभव है।
विधायकों और मंत्रियों की संपत्ति पर बहस
चमोली ने विधायकों और मंत्रियों की संपत्ति को लेकर कहा कि चुनाव के दौरान वे पहले ही अपनी संपत्ति का खुलासा कर देते हैं, जो चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध होता है। इसलिए कर्मचारियों से इसकी तुलना नहीं की जानी चाहिए। लेकिन कांग्रेस का कहना है कि अगर पारदर्शिता का मुद्दा है, तो इसे सभी स्तरों पर लागू किया जाए।
यह विवाद उत्तराखंड की राजनीति में नई बहस छेड़ रहा है, जहां कर्मचारी संगठन भी अब अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं। राज्य में सरकारी कर्मचारियों की भूमिका चुनावों में महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि वे मतदान प्रक्रिया से जुड़े कई काम संभालते हैं।
आगे क्या हो सकता है?
यह मुद्दा राज्य में राजनीतिक माहौल को और गर्मा सकता है। अगर कांग्रेस की मांग पर ध्यान नहीं दिया गया, तो विपक्ष बड़े आंदोलन की तैयारी कर सकता है। वहीं, सरकार का दावा है कि यह सिर्फ नियमों का पालन है, जो अंततः जनता के हित में है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में जहां विकास और रोजगार बड़े मुद्दे हैं, ऐसे विवाद चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर सकते हैं। पाठकों के लिए सलाह है कि सरकारी नियमों की जानकारी रखें और पारदर्शिता का समर्थन करें, ताकि व्यवस्था मजबूत बने।
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