Pithoragarh : उत्तराखंड के खूबसूरत हिमालयी इलाके पिथौरागढ़ में एक ऐसी घटना घटी जो पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर रही है। यहां एक परिवार की सात बेटियों ने अपने पिता की अंतिम यात्रा को न सिर्फ संभाला, बल्कि पुरानी परंपराओं को चुनौती देते हुए सभी रस्में खुद निभाईं। यह कहानी प्यार, हिम्मत और बदलते समय की गवाही देती है।
क्या हुआ था उस दिन
पिथौरागढ़ जिले की गंगोलीहाट तहसील से कुछ ही दूर सिमलकोट गांव में रहने वाले पूर्व फौजी किशन कन्याल की तबीयत अचानक बिगड़ गई। परिवार उन्हें नजदीकी अस्पताल ले गया, लेकिन हालत गंभीर देखते हुए डॉक्टरों ने हल्द्वानी भेजने की सलाह दी। दुर्भाग्य से रास्ते में ही उनका निधन हो गया। घर लौटते ही अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हुई, लेकिन कोई बेटा न होने से सब असमंजस में थे।
तभी परिवार की सातों बेटियां आगे आईं। उन्होंने फैसला किया कि पिता की अंतिम विदाई का जिम्मा वे खुद लेंगी। इनमें से एक बेटी किरन केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में सेवारत हैं। किरन ने अपनी वर्दी पहने हुए मुंडन कराया और बहनों के साथ मिलकर पिता की अर्थी को कंधा दिया।
श्मशान में भावुक पल
रामेश्वर श्मशान घाट पर पहुंचकर किरन के साथ शोभा, चांदनी, नेहा, बबली और दिव्यांशी ने चिता को मुखाग्नि दी। एक बहन मंजू किसी वजह से घाट तक नहीं पहुंच सकीं, लेकिन उन्होंने भी अर्थी उठाने में हिस्सा लिया। यह नजारा देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं। लोग भावुक होकर इन बेटियों की हिम्मत की तारीफ करने लगे।
पुरानी परंपराएं और बदलता समाज
हिंदू रीति-रिवाजों में आमतौर पर बेटे ही मुखाग्नि देते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इससे आत्मा को मुक्ति मिलती है। लेकिन आजकल कई जगहों पर बेटियां यह जिम्मेदारी निभा रही हैं। यह बदलाव दिखाता है कि समाज अब बेटियों को बराबरी का हक देने की ओर बढ़ रहा है। पिथौरागढ़ जैसी सीमावर्ती जगहों पर भी यह संदेश फैल रहा है कि बेटियां किसी से कम नहीं।
समाज को मिला बड़ा संदेश
स्थानीय जिला पंचायत सदस्य राहुल कुमार ने इस परिवार की बेटियों की खूब प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों की जीती-जागती मिसाल है। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि शिक्षित और सशक्त बेटियां परिवार और समाज दोनों का सहारा बन सकती हैं। पूरे इलाके में लोग इस साहस की चर्चा कर रहे हैं और उम्मीद है कि इससे और परिवार प्रेरित होंगे।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि प्यार और फर्ज में बेटा-बेटी का फर्क नहीं होता। बेटियां भी हर चुनौती का सामना कर सकती हैं और समाज को नई दिशा दे सकती हैं।
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