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Dehradun : DIT यूनिवर्सिटी में सैकड़ों छात्रों का ड्रग टेस्ट, पॉजिटिव निकला तो कॉलेज मालिक भी जाएंगे जेल

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DIT University Drug Checking : देहरादून जिला प्रशासन ने नशे के खिलाफ जो मुहिम छेड़ी है, वो अब कॉलेज कैंपस तक पहुँच गई है। बुधवार को DIT यूनिवर्सिटी में स्वास्थ्य विभाग की टीम ने सैकड़ों छात्र-छात्राओं का ड्रग टेस्ट किया। ये पहली बार नहीं है जब प्रशासन ने इतने बड़े स्तर पर टेस्टिंग की हो, लेकिन इस बार मैसेज बहुत साफ है नशा करने वालों को छोड़ा नहीं जाएगा, चाहे वो छात्र हो या संस्थान का मालिक।

टेस्टिंग का मकसद डराना नहीं, बचाना है

जिलाधिकारी सविन बंसल ने साफ कहा है कि ये टेस्टिंग छात्रों को डराने के लिए नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी और करियर बचाने के लिए की जा रही है। उनका कहना है कि आज का एक गलत कदम पूरा भविष्य बर्बाद कर सकता है। इसलिए टेस्ट में अगर कोई पॉजिटिव आता है तो सिर्फ़ छात्र ही नहीं, बल्कि कॉलेज प्रशासन, डीन और मालिक भी ज़िम्मेदार होंगे। उनके खिलाफ सीधे आपराधिक केस दर्ज होगा।

क्यों ज़रूरी है इतना सख्त कदम?

पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड के कॉलेजों में सिंथेटिक ड्रग्स और गांजे का चलन तेज़ी से बढ़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि 18-25 साल के युवा सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, देहरादून में ही पिछले दो साल में ड्रग ओवरडोज़ से 30 से ज़्यादा युवाओं की जान जा चुकी है। ऐसे में प्रशासन का मानना है कि सिर्फ़ छापेमारी से काम नहीं चलेगा स्कूल-कॉलेजों को ही नशा-मुक्त बनाना होगा।

हेल्पलाइन जो सचमुच मदद करती है

अगर कोई छात्र या अभिभावक नशे की लत से जूझ रहा है तो अब मदद सिर्फ़ एक कॉल दूर है।

टोल फ्री हेल्पलाइन: 1933 (मानस)

देहरादून डिस्ट्रिक्ट डी-एडिक्शन सेंटर: 9625777399

ये दोनों नंबर 24 घंटे काम करते हैं। कॉल करने पर काउंसलिंग से लेकर रिहैब तक की पूरी मदद मुफ्त मिलती है। प्रशासन का दावा है कि अब तक सैकड़ों युवाओं को इन हेल्पलाइन के ज़रिए नई ज़िंदगी मिल चुकी है।

आगे की तैयारी भी पूरी है। सभी कॉलेजों और स्कूलों के आसपास सीसीटीवी लगाए जा रहे हैं। हर शिक्षण संस्थान में एंटी ड्रग कमेटी को फिर से सक्रिय किया गया है। नशे की सूचना देने के लिए हर जगह बड़े-बड़े पोस्टर लगाए गए हैं।

आखिर में एक सवाल

जब पूरा सिस्टम ही नशे के खिलाफ एकजुट हो जाए तो क्या कोई युवा फिर भी लत की गिरफ्त में आएगा? प्रशासन का जवाब है बिल्कुल नहीं। और यही मुख्यमंत्री के “नशा मुक्त उत्तराखंड” के सपने को सच करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।

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